पैकेज वार में सरकार पर भारी पड़ते नक्सली….


पैकेज वार में सरकार पर भारी पड़ते नक्सली

नक्सलियों को हिंसा से दूर रहकर मुख्य धारा में जोड़ने की सरकारी कवायद पर नक्सली नेताओं की दिमागी कसरत भारी पड़ सकती है। सरकार ने सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए जो पैकेज तैयार किए हैं, उससे भारी पैकेज नक्सली नेताओं ने उन युवाओं के लिए बनाए हैं जो उनके साथ आएंगे। निश्चित रूप से इस पैकेज वार में कम से कम बेईमान बाबुओं में ईमानदार कामरेड भारी पड़ सकते हैं।

सरकार ने पुनर्वास नीति के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए अच्छा-खासा पैकेज तैयार किया है। इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं, लेकिन आशातीत सफलता अभी नहीं मिली है। इस बीच बिखराव जैसे हालात में पहुंच चुके नक्सलियों ने संगठन को मजबूत करने के लिए अपना पैकेज तैयार कर लिया है। सूत्रों का कहना है कि सीधे-सादे युवक-युवतियों को नक्सली पैकेज के जाल में फंसाकर हिंसा की राह पर डालने की तैयारी कर चुके हैं। पैकेज भी आकर्षक बनाया गया है। इसमें सरकार की तरह जमीन देने का वादा नहीं किया गया है, लेकिन मोटी राशि देने का भरोसा जरूर दिया गया है। इसका खुलासा बस्तर इलाके में पकड़े गए कुछ संदिग्ध लोगों ने पूछताछ में हुई है।

यह भी पता चला है कि माओवादी नेता नए जिलों में कमांडर की नियुक्ति की कवायद भी कर रहे हैं। साथियों के लगातार पकड़े जाने और मारे जाने से सतर्क हुए नक्सली संगठन को मजबूत करने साम-दाम, दंड भेद की नीति पर अमल कर रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पखवाड़ेभर पूर्व आंध्रप्रदेश सीमा से लगे दंतेवाड़ा के पास दंडाकारण्य जोनल कमेटी के सदस्यों की बैठक हुई।  मुठभेड़ में मारे गए कमांडर किशनजी की पत्नी सुजातक्का उर्फ सुजाता ने यह बैठक ली। इस बैठक में दो दर्जन से अधिक कमांडर प्रमुख और उल्फा से प्रशिक्षण लेकर पहुंचे चार युवक भी थे।

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हमारे अखबार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद…

‘हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन’, इस विषय पर शोध के दौरान हिन्दी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विषयवस्तु के तुलनात्मक अध्ययन की ओर गहराई से विश्लेषण करने का अवसर प्राप्त हुआ। यह विश्लेषण रोचक तो था ही राष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ महत्त्वपूर्ण सत्यों को उजागर करने वाला भी था। आगे बढ़ने से पहले हमें पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विशेषताओं को संक्षेप में जान लेना चाहिये।

पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सास्कृतिक राष्ट्रवाद
पूंजीवाद उत्पादक शक्तियों के स्वामित्व और संचालन की वह पद्धति है जिसके अतर्गत उत्पादक शक्तियों और व्यक्तियों को अपनी क्षमता तथा प्रतिभा के अनुसार पूंजी उत्पादन, संग्रहण, विनियोग और व्यापार पर सामान्यत: कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। समाजवाद वह सामाजिक व्यवस्था है जिसके अंतर्गत जीवन और समाज के सभी साधनों पर संपूर्ण समाज का स्वामित्व होता है – जिसका उपयोग पूर्ण समाज के कल्याण और विकास की भावना को लक्ष्य करके किया जाता है।साम्यवाद का ध्येय समाज में सर्वहारा और शोषित वर्ग के बीच पूंजी, अवस्था, व्यवस्था और अवसरों की समान उपलब्धता सुनिश्चित करना है। इसके समकक्ष सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वह परिकल्पना है जिसमें राष्ट्र की रचना का आधार आर्थिक या राजनैतिक न होकर सांस्कृतिक होता है।

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आशा भोसलें और तीजनबाई का तमाचा……?

कार्यक्रम में सबसे बाएं तीजनबाई और आशा भोसले

आशा भोंसले और तीजन बाई ने दिल्लीवालों की लू उतार दी। ये दोनों देवियाँ ‘लिम्का बुक ऑफ रेकार्ड’ के कार्यक्रम में दिल्ली आई थीं। संगीत संबंधी यह कार्यक्रम पूरी तरह अंग्रेजी में चल रहा था| यह कोई अपवाद नहीं था। आजकल दिल्ली में कोई भी कार्यक्रम यदि किसी पांच-सितारा होटल या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर जैसी जगहों पर होता है तो वहां हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के इस्तेमाल का प्रश्न ही नहीं उठता। इस कार्यक्रम में भी सभी वक्तागण एक के बाद एक अंग्रेजी झाड़ रहे थे। मंच संचालक भी अंग्रेजी बोल रहा था।

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वसंत में खिल उठते हैं पंच तत्व…..


ऋतुराज वसंत नाम क्यों है?
इसी दौरान नया संवत्‌ शुरू होने से नए साल के पहले त्योहार इसमें बसे रहने के कारण इसे वसंत कहा जाता है। फसल तैयार रहने से उल्लास और खुशी का आलम रहता है। मंगल कार्य, विवाह आदि भी इस दौरान होते हैं। सुहाना मौसम, फूलों की बहुतायत, तैयार खेती, मतवाला माहौल, आम पर बौर, खिलते कमल, सर्दी का जाता हड़कंप, सुहानी शाम आदि सब इसे ऋतुराज बनाते हैं।


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नर्मदा की महिमा का बखान……


आदिगुरु शंकराचार्यजी ने नर्मदाष्टक में माता को सर्वतीर्थ नायकम्‌ से संबोधित किया है। अर्थात माता को सभी तीर्थों का अग्रज कहा गया है। नर्मदा के तटों पर ही संसार में सनातन धर्म की ध्वज पताका लहराने वाले परमहंसी, योगियों ने तप कर संसार में अद्वितीय कार्य किए।

अनेक चमत्कार भी परमहंसियों ने किए जिनमें दादा धूनीवाले, दादा ठनठनपालजी महाराज, रामकृष्ण परमहंसजी के गुरु तोतापुरीजी महाराज, गोविंदपादाचार्य के शिष्य आदिगुरु शंकराचार्यजी सहित अन्य विभूतियां शामिल हैं।

प्रधानमंत्री घोषित करने की पॉलििटक्स….. …

प्रधानमंत्री घोषित करने की पॉलििटक्स

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी आजकल खूब मज़े ले रहे हैं. अपनी पार्टी के उन नेताओं का मजाक उड़ा रहे हैं जो अपने को २०१४ में प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. अभी कुछ दिन पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त बताकर लाल कृष्ण आडवाणी को सन्देश देने की कोशिश की थी. अब उन्होंने अरुण जेटली और सुषमा स्वराज को भी प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश कर दी है.

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रामायण रूपी भगीरथी को पृथ्वी पर उतारने का काम वाल्मीकि ने किया…

शिवपुराण में कहा गया है कि दयालु मनुष्य, अभिमानशून्य व्यक्ति, परोपकारी और जितेंद्रीय ये चार पवित्र स्तंभ हैं, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये चारों गुण एक साथ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र में समाहित होकर पृथ्वी की धारण शक्ति बन गए हैं। राम के इन्हीं वैयक्तिक सद्गुणों का उच्चतम आदर्श समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना वाल्मीकि रामायण का प्रमुख उद्देश्य है। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, भ्राता एवं आदर्श राजा- एक वचन, एक पत्नी, एक बाण जैसे व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले राम का चरित्र उकेरकर अहिंसा, दया, अध्ययन, सुस्वभाव, इंद्रिय दमन, मनोनिग्रह जैसे षट्‍गुणों से युक्त आदर्श चरित्र की स्थापना रामकथा का मुख्य प्रयोजन है। रामायण में वर्णित राम-लक्ष्मण-सीता ईश्वर स्वरूप हो सारे भरतखंड में पूजा-आराधना के केंद्र हो गए हैं। राम परिवार के वैचारिक, भाषिक एवं क्रियात्मक पराक्रम का वर्णन करना ही वाल्मीकि रामायण का प्रधान हेतु रहा है।

ब्रह्माजी के मानस पुत्र नारदजी से एक बार वाल्मीकि ने प्रश्न पूछा था- ‘संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला दृढ़प्रतिज्ञ कौन है? ऐसा कौन सा महापुरुष है जो आचार-विचार एवं पराक्रम में आदर्श माना जा सकता है।’ इस पर नारद का उत्तर था- ‘राम नाम से विख्यात, वे ही मन को वश में रखने वाले महा बलवान, कांतिमान, धैर्यवान और जितेंद्रीय हैं।’ उसी समय नारद ने अत्यंत भाव-विह्वल होकर संपूर्ण रामचरित्र वाल्मीकि के समक्ष प्रस्तुत किया।

रामचरित्र के महासागर में डूबे, राम जल से आकंठ भीगे, करुणा-प्रेम, भक्ति जैसे सकारात्मक रसों से आप्लावित वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर स्नान की इच्छा से आए। उनके हृदय में रामभक्ति का समुद्र लहरा रहा था। सारी सृष्टि ही मानो राममय हो गई थी। राम के दैविक गुण, मानवीय वृत्तियाँ, दया, उदारता, अहिंसा, अक्रोध, परदुःख, कातरता अभी भी उनके मन-मस्तिष्क पर छाई हुई थी कि शांत रस का सामना वीभत्स एवं हिंसा वृत्ति से हुआ। शीतल भूमि पर एकाएक दग्धता का अनुभव हुआ, जब सामने ही एक बहेलिए ने हिंसक भावों को प्रकट करते हुए निरपराध, मूक, मैथुनरत क्रौंच पक्षी को स्वार्थवश बाण से आहत कर दिया। अभी-अभी तो नारद से राम बाण, राम के शर संधान की कथा सुनी थी कि राम ने शौर्य, पराक्रम, दयालुता, उदारता आदि भावों का संरक्षण करते हुए दुष्टों के नाश एवं सज्जनों के परित्राण हेतु शस्त्र उठाए थे। …और कहाँ यह चरित्र कि अपने स्वार्थ हेतु मूक पक्षी को उस समय मार डाला जब कि वह सृष्टि की सृजन प्रक्रिया में मग्न था। दो धनुषधारी परंतु दोनों ही विपरीत दिशा में! राम के लोकहित में उठाए गए शस्त्रों के विपरीत यह शर संधान वीभत्स एवं शोक पैदा करने वाला था, जिसने वाल्मीकि को अंदर तक द्रवित कर दिया। क्रौंच पक्षी की पीड़ा से एकाकार हुए वाल्मीकि के मुँह से ‘मा निषाद…’ वाला श्लोक बह गया। सारी घनीभूत पीड़ा श्लोक में उतर आई।

क्रौंच वध से आहत वाल्मीकि निषाद को शाप देने के बाद विरोधी भावनाओं के समुद्र में डूबते-उतराते रहे। वे कर्तव्याकर्तव्य-करणीयाकरणीय के बीच द्वंद्वात्मक स्थिति में थे कि स्वर्ग से ब्रह्मा का आरोहण हुआ। वाल्मीकि सृष्टि के निर्माता एवं जगत के पितामह को स्वयं के द्वारा निषाद को शाप देने की कथा सुनाकर पश्चाताप करने लगे। इसी बीच अपने मुँह से निकले आदि श्लोक का भी वर्णन उन्होंने ब्रह्मा के समक्ष किया। वाल्मीकि के पश्चातापयुक्त वचन एवं आदि श्लोक की चर्चा सुनकर ब्रह्मा ने उन्हें धीरज बँधाकर दुःखी न होने को कहा। साथ ही आदेश दिया कि वे रामचरित्र का वैसा ही वर्णन करें जैसा उन्होंने ब्रह्मापुत्र नारद के मुँह से सुना था। ब्रह्मा ने इस कार्य की सफलता एवं सुसंचालन के लिए वाल्मीकि को वर दिया कि रामकथा का वर्णन करते हुए तुम्हें गुप्त एवं अज्ञात चरित्र भी ज्ञात और उजागर हो जाएँगे तथा तुम अपने योग धर्म से चरित्रों का अनुसंधान भी कर पाओगे। साथ ही जब तक सृष्टि में पर्वत-नदियाँ रहेंगे, तब तक लोग रामकथा का गान करते रहेंगे।

अपने शोक को श्लोक में प्रकट करने वाले वाल्मीकि आदि कवि कहलाए। वे कवियों के प्रथम सृष्टि पुरुष हुए, तभी तो ‘विश्व’ जैसे संस्कृत भाषा के शब्दकोश में कवि का अर्थ ही ‘वाल्मीकि’ दिया गया है। आदि कवि वाल्मीकि की रचना ‘रामायण’ संस्कृत भाषा का पहला ‘आर्ष महाकाव्य’ माना जाता है।

इतिहास पर आधारित एवं सदाचारसंपन्न आदर्शों का प्रतिपादन करने वाले काव्य को ‘आर्ष महाकाव्य’ कहा जाता है। वह सद्गुणों एवं सदाचारों का पोषक, धीरोदात्त, गहन आशय से परिपूर्ण, श्रवणीय छंदों से युक्त होता है। यह सर्वविदित है कि संस्कृत तमाम भारतीय भाषाओं की जननी है। अतः यह महाकाव्य तमाम भारतीय भाषाओं का पहला महाकाव्य है।

वाल्मीकि के पूर्व रामकथा मौखिक रूप से विद्यमान थी। वाल्मीकि रामायण भी दीर्घकाल तक मौखिक रूप में रही। इस मौखिक काव्य रचना को रामपुत्र लव-कुश ने कंठस्थ किया एवं वर्षों तक उसे सुनाते रहे। राम की सभा में लव-कुश द्वारा कथा सुनाने के प्रसंग पर राम अपने भाइयों से कहते हैं- ‘ये जिस चरित्र का, काव्य का गान कर रहे हैं वह शब्दालंकार, उत्तम गुण एवं सुंदर रीति आदि से युक्त होने के कारण अत्यंत प्रभावशाली एवं अभ्युदयकारी है, ऐसा वृद्ध पुरुषों का कथन है। अतः तुम सब लोग इसे ध्यान देकर सुनो।’

अंत में इस मौखिक काव्य को लिपिबद्ध करने का काम भी वाल्मीकि द्वारा ही किया गया। राम के वन से अयोध्या लौटने के बाद रामायण की रचना हुई, जिसमें 24,000 श्लोक, 500 सर्ग एवं 7 काण्ड हैं। इन 7 काण्डों पर विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि 2 से 6 तक के काण्ड अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुन्दर एवं युद्ध काण्ड वाल्मीकि रचित हैं। प्रथम एवं सातवां (बाल एवं उत्तर काण्ड) वाल्मीकि रचित नहीं हैं। इस रामकथा को ‘पौलत्स्य वध’ तथा दशानन वध भी कहा गया है। सारतः कहा जा सकता है कि रामायण रूपी भगीरथी को पृथ्वी पर उतारने का काम वाल्मीकि ने किया।

जंगल को जानने का असभ्य नजरिया….

जंगल को जानने का असभ्य नजरिया

जंगल को जानने का असभ्य नजरिया

यदि आप विदेशी हैं और केवल दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों तक घूमे हैं तो मुमकिन है आप इस देश को विकसित राष्ट्र के श्रेणी में आराम से रख सकते हैं. जैसा कि पिछले दिनों ओबामा ने भी माना. कभी सांप और जंगलों के लिए मशहूर भारत में आज जंगल शब्द के मायने ही बदल गये हैं. आज कथित विकसित भारत की आत्मा किसी गांव या जंगल में नहीं बसती. दिल्ली और बंगलौर को देखकर ही हम उसे भारत की आत्मा समझ लेते हैं. और इस भारत की नयी आत्मा में रहनेवाले लोग जंगल और जंगलवासियों को जैसे देखते हैं वह देखने का सभ्य तरीका तो बिल्कुल नहीं है. जंगल को वे निहायत जंगली सोच के साथ देखते हैं.

जिस तरह से सरकार जंगलों को कॉरपोरेट हाथों में बिना किसी हिचक के देती जा रही है उससे जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराता नजर आता है. एक तो साल-दर-साल जारी आंकड़े में जंगलों का क्षेत्रफल सिमटता जा रहा है. फिर भी यदि हमारी सरकार सचेत नहीं होती है तो यह चिंताजनक बात है.

जिस तरह से सारे विश्व में पर्यावरण को लेकर चिंताएं जतायी जा रही हैं. क्योटो से लेकर कोपनहेगन तक चर्चा और बहस का दौर गर्म है. ऐसे में चंद कॉरपोरेट हितों को साधने के लिए जंगलों को नष्ट करना न तो देश हित में है और न ही सदियों से जंगलो में रहते आ रहे समुदायों के हित में. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिस सरकार पर इन आदिवासियों के लिए विकास की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी थी वही सरकार इन पर गोलियां बरसा रही है.यदि झारखंड का ही उदाहरण लें तो हाल ही में ऑपरेशन एनाकोंडा के शिकार कितने आदिवासी हुए हैं. लोगों के आंखे फोड़ी जा रही है तो कहीं पुलिस बलात्कार कर रही है. खुद पूलिस भी इस बात को स्वीकार करती है कि चाईबासा जिले के गांव बलवा का रहने वाला मंगल की मौत गलती से हुई है. आज न जाने कितने मंगल देश के जंगलों में मिल जायेंगे.

दिल्ली मुंबई की चकाचौंध में हम अक्सर देश के जंगलों और वहां रहने वाले लोगों को भूल जाते हैं.हमारी मीडिया भी इन जंगलों की समस्या को नहीं दिखाना चाहती क्योंकि उनका दर्शक वर्ग अभिजात्य मध्य वर्ग है जिसकी दिलचस्पी कार और नये मोबाईल हैंडसेट में ज्यादा है. यदि मीडिया इन जंगलों के बारे में दिखाती भी है तो तब जब किशनजी या आजाद जैसे नक्स्ली नेताओं की कथित मुठभेड़ में मौत हो जाती है.किसी शहरी मध्यमवर्गीय परिवार के लड़की की हत्या पर जो मीडिया पानी पी-पी कर देश के कानून व्यवस्था को गाली देता है वही मीडिया जब सोनी सोरी के साथ हुए अमानवीय पुलिसिया जुल्म के खिलाफ आह तक नहीं निकालती तो उसके जनसरोकारी होने का दावा खोखला साबित होता है.आखिर क्या कारण है कि जो मीडिया शहरी महिलाओं के खिलाफ हो रहे जूल्म के लिए आंदोलन करती है वही मीडिया आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहे ज्यादतियां पर चुप्पी साधे रहती है.

समस्या तब और गहरी हो जाती है जब कथित सभ्य समाज रोज-ब-रोज आदिवासियों पर हो रहे जूल्म के खिलाफ चुप्पी धारण किये रहता है. वैसे भी जिस आधुनिक समाज ने आदवासियों को जंगलों की तरफ धकेल कर अपना जगह बनाया हो उससे इससे अधिक उम्मीद भी नहीं की जा सकती.

मीडिया ने जंगलों की इस तरह से छवि निर्माण किया है कि आज जंगल शब्द का नाम सुनते ही माओवादी याद आते हैं, एक पिछड़ी हुई जगह याद आती है और साथ में डर भी. सरकार और माओवादियों के बीच आदिवासी मरने को विवश हैं. पुलिस माओवादी होने के नाम पर पकड़ लेती है तो दूसरी और माओवादी जबरदस्ती हाथों में बंदुक थमा देते हैं. या तो सरकारों के द्वारा कोई स्कुल नहीं बनाया जाता और यदि भूले-भटके ऐसा किया भी जाता है तो उसे माओवादी विस्फोट कर उड़ा देते हैं.

झारखंड में तो कॉरपोरेट ताकतों की गिद्ध नजर जंगलों और प्राकृतिक संपदा पर टिकी हुई है. उनकी इच्छा तो सिर्फ सस्ता खनिज अयस्क, सस्ते मजदूर, और मोटा मुनाफा कमाने की है. वे पहाड़ खोद रहे हैं, नदियों को सुखा रहे हैं, आदिवासियों को सस्ते मजदूर के रुप में इस्तेमाल कर रहे हैं और अपना घर भर रहे हैं.माओवादियों के नाम पर सरकार जंगलों में पुलिसिया राज कायम कर रही है. आम लोगों को डराया धमकाया जा रहा है, जिससे ये लोग जंगल खाली करने पर मजबूर हैं.और यह सब इसलिए हो रहा है कि कॉरपोरेट कंपनियां आसानी से प्राकृतिक संसाधनों को लूट सके.

पिछले दस सालों में झारखंड सरकार ने बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के साथ लगभग 104 समझौते पर दस्तखत किए हैं. सेंसेक्स की बढ़ती ऊचाईयों में हमें याद भी नहीं रहता कि आज भी हमारे जंगलों में रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. आज भी उन तक पीने का पानी, स्वास्थ्य सुविधायें आदि पहुँचा पाने में हमारी सरकार असफल रही है. इस तथाकथित विकास ने बड़े पैमाने पर इन आदिवासियों का विस्थापन किया है. आज कोई नहीं जानता कि वे कहां हैं, किस दशा में हैं. आज जंगलों की पहचान, भाषा, इतिहास, संस्कृति, पहाड़ प्रकृति सब कुछ दांव पर लगा हुआ है औऱ इनकों बचाने के लिए उनका संघर्ष भी जारी है.

मानो या ना मानो नजर लगती है…..

नजर उतारने का अचूक मंत्र

* नजर उतारने का अचूक मंत्र।
* भगवती गायत्री की साधना कर मंत्र सिद्ध करें।
* मोर के पंख से झाड़ने से उतरेगी नजर।

ॐ नमो सत्य नाम आदेशगुरु को
ॐ नमो नजर जहां पर पीर न जानी
बोले छल सो अमरत बानी
कहो नजर कहां ते आई

यहां की ठौर तोहि कौन बताई
कौन जात तेरा कहां ठाम
किसकी बेटी कह तेरो नाम
कहां से उड़ी कहां को जाय

अब ही बस कर ले तेरी माया
मेरी बात सुनो चित लाए
जैसी होय सुनाऊं आय
तेलिन तमोलिन चुहड़ी चमारी

कायस्थनी खतरानी कुम्हारी
महतरानी राजा की रानी
जाको दोष ताहि को सिर पड़े
जहार पीर नजर से रक्षा करे

मेरी भक्ति गुरु की शक्ति
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।

उपरोक्त मंत्र को पढ़ते हुए मोर के पंख से बाल के सिर से पैर तक झाड़ दें। इस क्रिया से बालक की नजर उतर जाएगी और बालक स्वस्थ हो जाएगा।

इसी प्रकार आप ग्रहण के दिन भगवती गायत्री की साधना कर मंत्र को सिद्ध कर लें फिर आप किसी भी बालक की नजर को झाड़ सकते हैं। अवश्य सफलता प्राप्त होगी। यह अचूक प्रयोग है। उपरोक्त मंत्र विश्वास के साथ करें। कार्य अवश्य होगा।

February 2012
M T W T F S S
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